न कह तू शैख़ मुझे ज़ोहद सीख मस्ती छोड़
तिरी पसंद जुदा है मिरी पसंद जुदा
इंशा अल्लाह ख़ान
न लगी मुझ को जब उस शोख़-ए-तरहदार की गेंद
उस ने महरम को सँभाल और ही तय्यार की गेंद
इंशा अल्लाह ख़ान
नज़ाकत उस गुल-ए-राना की देखियो 'इंशा'
नसीम-ए-सुब्ह जो छू जाए रंग हो मैला
इंशा अल्लाह ख़ान
साँवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की
जी में है कह बैठिए अब जय कनहय्या लाल की
इंशा अल्लाह ख़ान
सनम-ख़ाना जाता हूँ तू मुझ को नाहक़
न बहका न बहका न बहका न बहका
इंशा अल्लाह ख़ान
शैख़-जी ये बयान करो हम भी तो बारी कुछ सुनें
आप के हाथ क्या लगा ख़ल्वत-ओ-एतिकाफ़ में
इंशा अल्लाह ख़ान
सुब्ह-दम मुझ से लिपट कर वो नशे में बोले
तुम बने बाद-ए-सबा हम गुल-ए-नसरीन हुए
इंशा अल्लाह ख़ान

