EN اردو
रिफ़अत कभी किसी की गवारा यहाँ नहीं | शाही शायरी
rifat kabhi kisi ki gawara yahan nahin

ग़ज़ल

रिफ़अत कभी किसी की गवारा यहाँ नहीं

इमाम बख़्श नासिख़

;

रिफ़अत कभी किसी की गवारा यहाँ नहीं
जिस सर-ज़मीं के हम हैं वहाँ आसमाँ नहीं

दो रोज़ एक वज़्अ पे रंग-ए-जहाँ नहीं
वो कौन सा चमन है कि जिस को ख़िज़ाँ नहीं

इबरत की जा है लाखों ही तिफ़्ल ओ जवाँ नहीं
पीरी में भी ख़याल अजल का यहाँ नहीं

दुश्मन अगर वो दोस्त हुआ है तो क्या अजब
याँ ए'तिमाद-ए-दोस्ती-ए-जिस्म-ओ-जाँ नहीं

रफ़्तार नाज़ में ये लचक जाती है कि बस
गोया तिरी कमर में सनम उस्तुखाँ नहीं

मुनइम के शुक्र में भी हिलाएँ कभी कभी
तन्हा बराए-लज़्ज़त-ए-दुनिया ज़बाँ नहीं

पज़मुर्दा एक है तो शगुफ़्ता है दूसरा
बाग़-ए-जहाँ में फ़स्ल-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ नहीं

जिन के सुरों पर आप मगस-राँ रहे हुमा
उन का लहद में आज कोई उस्तुखाँ नहीं

धोका न खा ज़ुरूफ़-ए-वज़ू को तू देख कर
मस्जिद है मय-फ़रोश की 'नासिख़' दुकाँ नहीं