ऐ मिरी जान अपने जी के सिवा
कौन तेरा है कौन मेरा है
हफ़ीज़ जालंधरी
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ब-ज़ाहिर सादगी से मुस्कुरा कर देखने वालो
कोई कम-बख़्त ना-वाक़िफ़ अगर दीवाना हो जाए
हफ़ीज़ जालंधरी
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बे-तअल्लुक़ ज़िंदगी अच्छी नहीं
ज़िंदगी क्या मौत भी अच्छी नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
भुलाई नहीं जा सकेंगी ये बातें
तुम्हें याद आएँगे हम याद रखना
हफ़ीज़ जालंधरी
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बुत-कदे से चले हो काबे को
क्या मिलेगा तुम्हें ख़ुदा के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
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चराग़-ए-ख़ाना-ए-दर्वेश हों मैं
इधर जलता अधर बुझता रहा हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
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देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़
अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई
हफ़ीज़ जालंधरी

