ग़म-ए-ज़िंदगानी के सब सिलसिले
बिल-आख़िर ग़म-ए-इश्क़ से जा मिले
हफ़ीज़ होशियारपुरी
हम को मंज़िल ने भी गुमराह किया
रास्ते निकले कई मंज़िल से
हफ़ीज़ होशियारपुरी
जब कभी हम ने किया इश्क़ पशेमान हुए
ज़िंदगी है तो अभी और पशेमाँ होंगे
हफ़ीज़ होशियारपुरी
कहीं ये तर्क-ए-मोहब्बत की इब्तिदा तो नहीं
वो मुझ को याद कभी इस क़दर नहीं आए
हफ़ीज़ होशियारपुरी
नज़र से हद्द-ए-नज़र तक तमाम तारीकी
ये एहतिमाम है इक वा'दा-ए-सहर के लिए
हफ़ीज़ होशियारपुरी
तमाम उम्र किया हम ने इंतिज़ार-ए-बहार
बहार आई तो शर्मिंदा हैं बहार से हम
हफ़ीज़ होशियारपुरी
तमाम उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया
इस इंतिज़ार में किस किस से प्यार हम ने किया
हफ़ीज़ होशियारपुरी

