जो पर्दों में ख़ुद को छुपाए हुए हैं
क़यामत वही तो उठाए हुए हैं
हफ़ीज़ बनारसी
कभी ख़िरद कभी दीवानगी ने लूट लिया
तरह तरह से हमें ज़िंदगी ने लूट लिया
हफ़ीज़ बनारसी
किस मुँह से करें उन के तग़ाफ़ुल की शिकायत
ख़ुद हम को मोहब्बत का सबक़ याद नहीं है
हफ़ीज़ बनारसी
किसी का घर जले अपना ही घर लगे है मुझे
वो हाल है कि उजालों से डर लगे है मुझे
हफ़ीज़ बनारसी
कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है
दुनिया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर नहीं है
हफ़ीज़ बनारसी
मैं ने आबाद किए कितने ही वीराने 'हफ़ीज़'
ज़िंदगी मेरी इक उजड़ी हुई महफ़िल ही सही
हफ़ीज़ बनारसी
मिले फ़ुर्सत तो सुन लेना किसी दिन
मिरा क़िस्सा निहायत मुख़्तसर है
हफ़ीज़ बनारसी

