वो बात 'हफ़ीज़' अब नहीं मिलती किसी शय में
जल्वों में कमी है कि निगाहों में कमी है
हफ़ीज़ बनारसी
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ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को
हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ़्तर है
हफ़ीज़ बनारसी
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अब यही मेरे मशाग़िल रह गए
सोचना और जानिब-ए-दर देखना
हफ़ीज़ होशियारपुरी
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दिल में इक शोर सा उठा था कभी
फिर ये हंगामा उम्र भर ही रहा
हफ़ीज़ होशियारपुरी
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दिल से आती है बात लब पे 'हफ़ीज़'
बात दिल में कहाँ से आती है
हफ़ीज़ होशियारपुरी
दुनिया में हैं काम बहुत
मुझ को इतना याद न आ
हफ़ीज़ होशियारपुरी
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ग़म-ए-ज़माना तिरी ज़ुल्मतें ही क्या कम थीं
कि बढ़ चले हैं अब इन गेसुओं के भी साए
हफ़ीज़ होशियारपुरी
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