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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हज़ारों इस में रहने के लिए आए
मकाँ मैं ने तसव्वुर में बनाया था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर




हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
अब तक याद का पत्ता पत्ता डाली से पैवस्ता है

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर




इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर
गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर




इस तरह क़हत-ए-हवा की ज़द में है मेरा वजूद
आँधियाँ पहचान लेती हैं ब-आसानी मुझे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर




जिन की दर्द-भरी बातों से एक ज़माना राम हुआ
'क़ासिर' ऐसे फ़न-कारों की क़िस्मत में बन-बास रहा

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर




जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक
मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँ बोता है

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर




कहते हैं इन शाख़ों पर फल फूल भी आते थे
अब तो पत्ते झड़ते हैं या पत्थर गिरते हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर