हज़ारों इस में रहने के लिए आए
मकाँ मैं ने तसव्वुर में बनाया था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
अब तक याद का पत्ता पत्ता डाली से पैवस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर
गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
इस तरह क़हत-ए-हवा की ज़द में है मेरा वजूद
आँधियाँ पहचान लेती हैं ब-आसानी मुझे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जिन की दर्द-भरी बातों से एक ज़माना राम हुआ
'क़ासिर' ऐसे फ़न-कारों की क़िस्मत में बन-बास रहा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक
मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँ बोता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कहते हैं इन शाख़ों पर फल फूल भी आते थे
अब तो पत्ते झड़ते हैं या पत्थर गिरते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

