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शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ शायरी | शाही शायरी

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ शेर

69 शेर

मिरा घर तेरी मंज़िल गाह हो ऐसे कहाँ तालेअ'
ख़ुदा जाने किधर का चाँद आज ऐ माह-रू निकला

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




मोअज़्ज़िन मर्हबा बर-वक़्त बोला
तिरी आवाज़ मक्के और मदीने

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में ऐ 'ज़ौक़'
उस ने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाकत वाले

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




नाज़ुक-कलामियाँ मिरी तोड़ें अदू का दिल
मैं वो बला हूँ शीशे से पत्थर को तोड़ दूँ

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




निकालूँ किस तरह सीने से अपने तीर-ए-जानाँ को
न पैकाँ दिल को छोड़े है न दिल छोड़े है पैकाँ को

how do I from my breast dislodge my love's arrow
this barb doesn’t leave my heart nor does my heart let go

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




फिर मुझे ले चला उधर देखो
दिल-ए-ख़ाना-ख़राब की बातें

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




फूल तो दो दिन बहार-ए-जाँ-फ़ज़ा दिखला गए
हसरत उन ग़ुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गए

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'
नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ-मर्द हो गया

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़