कहा ये सब ने कि जो वार थे उसी पर थे
मगर ये क्या कि बदन चूर चूर मेरा था
मज़हर इमाम
जब हम तेरा नाम न लेंगे
वो भी एक ज़माना होगा
मज़हर इमाम
हमें वो हमीं से जुदा कर गया
बड़ा ज़ुल्म इस मेहरबानी में था
मज़हर इमाम
आप को मेरे तआरुफ़ की ज़रूरत क्या है
मैं वही हूँ कि जिसे आप ने चाहा था कभी
मज़हर इमाम
हैं चनारों के चेहरे भी झुलसे हुए
ज़ख़्म सब का हरा है तिरे शहर में
मज़हर इमाम
एक मैं ने ही उगाए नहीं ख़्वाबों के गुलाब
तू भी इस जुर्म में शामिल है मिरा साथ न छोड़
मज़हर इमाम
एक दर्द-ए-जुदाई का ग़म क्या करें
किस मरज़ की दवा है तिरे शहर में
मज़हर इमाम
दोस्तों से मुलाक़ात की शाम है
ये सज़ा काट कर अपने घर जाऊँगा
मज़हर इमाम
चलो हम भी वफ़ा से बाज़ आए
मोहब्बत कोई मजबूरी नहीं है
मज़हर इमाम

