मुफ़्त बोसा हसीं नहीं देते
दिल जो देते हैं दाम लेते हैं
इम्दाद इमाम असर
मर ही कर उट्ठेंगे तेरे दर से हम
आ के जब बैठे तो फिर उठ जाएँ क्या
इम्दाद इमाम असर
लोग जब तेरा नाम लेते हैं
हम कलेजे को थाम लेते हैं
इम्दाद इमाम असर
कुछ समझ कर उस मह-ए-ख़ूबी से की थी दोस्ती
ये न समझे थे कि दुश्मन आसमाँ हो जाएगा
इम्दाद इमाम असर
ख़ूब-ओ-ज़िश्त-ए-जहाँ का फ़र्क़ न पूछ
मौत जब आई सब बराबर था
इम्दाद इमाम असर
आइना देख के फ़रमाते हैं
किस ग़ज़ब की है जवानी मेरी
इम्दाद इमाम असर
करता है ऐ 'असर' दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता का गिला
आशिक़ वो क्या कि ख़स्ता-ए-तेग़-ए-जफ़ा न हो
इम्दाद इमाम असर
कैसा आना कैसा जाना मेरे घर क्या आओगे
ग़ैरों के घर जाने से तुम फ़ुर्सत किस दिन पाते हो
इम्दाद इमाम असर
जब नहीं कुछ ए'तिबार-ए-ज़िंदगी
इस जहाँ का शाद क्या नाशाद क्या
इम्दाद इमाम असर

