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फ़ना निज़ामी कानपुरी शायरी | शाही शायरी

फ़ना निज़ामी कानपुरी शेर

35 शेर

मैं चला आया तिरा हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल ले कर
अब तिरी अंजुमन-ए-नाज़ में रक्खा क्या है

फ़ना निज़ामी कानपुरी




तर्क-ए-वतन के बाद ही क़द्र-ए-वतन हुई
बरसों मिरी निगाह में दीवार-ओ-दर फिरे

फ़ना निज़ामी कानपुरी




तरतीब दे रहा था मैं फ़हरिस्त-ए-दुश्मनान
यारों ने इतनी बात पे ख़ंजर उठा लिया

फ़ना निज़ामी कानपुरी




तिरे वा'दों पे कहाँ तक मिरा दिल फ़रेब खाए
कोई ऐसा कर बहाना मिरी आस टूट जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी




तू कुछ तो मिरे ज़ब्त-ए-मोहब्बत का सिला दे
हंगामा-ए-'फ़ना दीदा-ए-पुर-नम की तरह आ

फ़ना निज़ामी कानपुरी




तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ
अब के किसी बे-नाम से मौसम की तरह आ

फ़ना निज़ामी कानपुरी




वो आँख क्या जो आरिज़ ओ रुख़ पर ठहर न जाए
वो जल्वा क्या जो दीदा ओ दिल में उतर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी




यूँ दिखाता है आँखें हमें बाग़बाँ
जैसे गुलशन पे कुछ हक़ हमारा नहीं

फ़ना निज़ामी कानपुरी




ज़िंदगी नाम है इक जोहद-ए-मुसलसल का 'फ़ना'
राह-रौ और भी थक जाता है आराम के बा'द

फ़ना निज़ामी कानपुरी