लोग क्या सादा हैं उम्मीद-ए-वफ़ा रखते हैं
जैसे मा'लूम नहीं उन को हक़ीक़त तेरी
अतहर नादिर
कोई नहीं है ऐसा कि अपना कहें जिसे
कैसा तिलिस्म टूटा है अपने गुमान का
अतहर नादिर
आदमी का अमल से रिश्ता है
काम आता नहीं नसब कुछ भी
अतहर नादिर
किस दर्जा मिरे शहर की दिलकश है फ़ज़ा भी
मानूस हर इक चीज़ है मिट्टी भी हवा भी
अतहर नादिर
कटा न कोह-ए-अलम हम से कोहकन की तरह
बदल सका न ज़माना तिरे चलन की तरह
अतहर नादिर
जो देखता हूँ ज़माने की ना-शनासी को
ये सोचता हूँ कि अच्छा था बे-हुनर रहता
अतहर नादिर
जो देखिए तो ज़माना है तेज़-रौ कितना
तुलू-ए-सुब्ह अभी है तो वक़्त-ए-शाम अभी
अतहर नादिर
जब भी मिलता है मुस्कुराता है
ख़्वाह उस का हो अब सबब कुछ भी
अतहर नादिर
हो गई शाम ढल गया सूरज
दिन को शब में बदल गया सूरज
अतहर नादिर

