यूँ दिखाता है आँखें हमें बाग़बाँ
जैसे गुलशन पे कुछ हक़ हमारा नहीं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
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ज़िंदगी नाम है इक जोहद-ए-मुसलसल का 'फ़ना'
राह-रौ और भी थक जाता है आराम के बा'द
फ़ना निज़ामी कानपुरी
आँख उठाई ही थी कि खाई चोट
बच गई आँख दिल पे आई चोट
फ़ानी बदायुनी
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आबादी भी देखी है वीराने भी देखे हैं
जो उजड़े और फिर न बसे दिल वो निराली बस्ती है
फ़ानी बदायुनी
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आते हैं अयादत को तो करते हैं नसीहत
अहबाब से ग़म-ख़्वार हुआ भी नहीं जाता
फ़ानी बदायुनी
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अब नए सुर से छेड़ पर्दा-ए-साज़
मैं ही था एक दुख-भरी आवाज़
फ़ानी बदायुनी
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ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए
मुझ को ख़याल-ए-यार कहीं ढूँडता न हो
फ़ानी बदायुनी
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