मैं चला आया तिरा हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल ले कर
अब तिरी अंजुमन-ए-नाज़ में रक्खा क्या है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मौजों के इत्तिहाद का आलम न पूछिए
क़तरा उठा और उठ के समुंदर उठा लिया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात भी क्या चीज़ है 'फ़ना'
राह-ए-फ़रार मिल न सकी उम्र-भर फिरे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
रहता है वहाँ ज़िक्र-ए-तुहूर-ओ-मय-ए-कौसर
हम आज से काबे को भी मय-ख़ाना कहेंगे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
रिंद जन्नत में जा भी चुके
वाइज़-ए-मोहतरम रह गए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
सब होंगे उस से अपने तआरुफ़ की फ़िक्र में
मुझ को मिरे सुकूत से पहचान जाएगा
फ़ना निज़ामी कानपुरी
सहता रहा जफ़ा-ए-दोस्त कहता रहा अदा-ए-दोस्त
मेरे ख़ुलूस ने मिरा जीना मुहाल कर दिया
फ़ना निज़ामी कानपुरी

