वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है
दुष्यंत कुमार
यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
दुष्यंत कुमार
ये लोग होमो-हवन में यक़ीन रखते हैं
चलो यहाँ से चलें हाथ जल न जाए कहीं
दुष्यंत कुमार
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज्दे में नहीं था आप को धोका हुआ होगा
दुष्यंत कुमार
ये सोच कर कि दरख़्तों में छाँव होती है
यहाँ बबूल के साए में आ के बैठ गए
दुष्यंत कुमार
ज़िंदगी जब अज़ाब होती है
आशिक़ी कामयाब होती है
दुष्यंत कुमार
अश्कों के निशाँ पर्चा-ए-सादा पे हैं क़ासिद
अब कुछ न बयाँ कर ये इबारत ही बहुत है
अहसन अली ख़ाँ

