ज़िद हर इक बात पर नहीं अच्छी
दोस्त की दोस्त मान लेते हैं
दाग़ देहलवी
ज़ीस्त से तंग हो ऐ 'दाग़' तो जीते क्यूँ हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं
दाग़ देहलवी
ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते
पर तुम्हें शर्मसार कौन करे
दाग़ देहलवी
एक दिन नक़्श-ए-क़दम पर मिरे बन जाएगी राह
आज सहरा में तो तन्हा हूँ कहीं कोई नहीं
दामोदर ठाकुर ज़की
इश्क़ की राहों में आया है इक ऐसा भी मक़ाम
सिर्फ़ इक मैं हूँ वहाँ अहल-ए-ज़मीं कोई नहीं
दामोदर ठाकुर ज़की
आख़िरी वक़्त तलक साथ अंधेरों ने दिया
रास आते नहीं दुनिया के उजाले मुझ को
दानिश अलीगढ़ी
अपने दुश्मन को भी ख़ुद बढ़ के लगा लो सीने
बात बिगड़ी हुई इस तरह बना ली जाए
दानिश अलीगढ़ी

