मौत आएगी उस से मिल लेंगे
अब चलो ज़िंदगी से मिलते हैं
चमन लाल चमन
हाए कितना लतीफ़ है वो ग़म
जिस ने बख़्शा है ज़िंदगी का शुऊर
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
अपनी दीवारों से कुछ बाहर निकल
सिर्फ़ ख़ाली घर के बाम-ओ-दर न देख
चन्द्रभान ख़याल
हमारे घर के आँगन में सितारे बुझ गए लाखों
हमारी ख़्वाब गाहों में न चमका सुब्ह का सूरज
चन्द्रभान ख़याल
इंसान की दुनिया में इंसाँ है परेशाँ क्यूँ
मछली तो नहीं होती बेचैन कभी जल में
चन्द्रभान ख़याल
कर गया सूरज सभी को बे-लिबास
अब कोई साया कोई पैकर न देख
चन्द्रभान ख़याल
कौन दहशत-गर्द है और कौन है दहशत-ज़दा
ये सब इक इबहाम-ए-पैहम के सिवा कुछ भी नहीं
चन्द्रभान ख़याल

