मैं थोड़ी देर भी आँखों को अपनी बंद कर लूँ तो
अँधेरों में मुझे इक रौशनी महसूस होती है
भारत भूषण पन्त
सबब ख़ामोशियों का मैं नहीं था
मिरे घर में सभी कम बोलते थे
भारत भूषण पन्त
शायद बता दिया था किसी ने मिरा पता
मीलों मिरी तलाश में रस्ता निकल गया
भारत भूषण पन्त
सूरज से उस का नाम-ओ-नसब पूछता था मैं
उतरा नहीं है रात का नश्शा अभी तलक
भारत भूषण पन्त
तू हमेशा माँगता रहता है क्यूँ ग़म से नजात
ग़म नहीं होंगे तो क्या तेरी ख़ुशी बढ़ जाएगी
भारत भूषण पन्त
उम्मीदों से पर्दा रक्खा ख़ुशियों से महरूम रहीं
ख़्वाब मरा तो चालिस दिन तक सोग मनाया आँखों ने
भारत भूषण पन्त
उस को भी मेरी तरह अपनी वफ़ा पर था यक़ीं
वो भी शायद इसी धोके में मिला था मुझ को
भारत भूषण पन्त

