उसे इक बुत के आगे सर झुकाते सब ने देखा है
वो काफ़िर ही सही पक्का मगर ईमान रखता है
भारत भूषण पन्त
वर्ना तो हम मंज़र और पस-मंज़र में उलझे रहते
हम ने भी सच मान लिया जो कुछ दिखलाया आँखों ने
भारत भूषण पन्त
याद भी आता नहीं कुछ भूलता भी कुछ नहीं
या बहुत मसरूफ़ हूँ मैं या बहुत फ़ुर्सत में हूँ
भारत भूषण पन्त
ये क्या कि रोज़ पहुँच जाता हूँ मैं घर अपने
अब अपनी जेब में अपना पता न रक्खा जाए
भारत भूषण पन्त
ये क्या कि रोज़ उभरते हो रोज़ डूबते हो
तुम एक बार में ग़र्क़ाब क्यूँ नहीं होते
भारत भूषण पन्त
ये सब तो दुनिया में होता रहता है
हम ख़ुद से बे-कार उलझने लगते हैं
भारत भूषण पन्त
ये सूरज कब निकलता है उन्हीं से पूछना होगा
सहर होने से पहले ही जो बिस्तर छोड़ देते हैं
भारत भूषण पन्त

