चलने की नहीं आज कोई घात किसी की
सुनने के नहीं वस्ल में हम बात किसी की
बेख़ुद देहलवी
चश्म-ए-बद-दूर वो भोले भी हैं नादाँ भी हैं
ज़ुल्म भी मुझ पे कभी सोच-समझ कर न हुआ
बेख़ुद देहलवी
दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा
तुझ को आता है ख़ुदा याद हमारे होते
बेख़ुद देहलवी
दिल चुरा कर ले गया था कोई शख़्स
पूछने से फ़ाएदा, था कोई शख़्स
बेख़ुद देहलवी
दिल हुआ जान हुई उन की भला क्या क़ीमत
ऐसी चीज़ों के कहीं दाम दिए जाते हैं
बेख़ुद देहलवी
दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं
मेरे रूठे हुए मेहमान चले आते हैं
बेख़ुद देहलवी
दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद'
अब किसी पर फ़िदा नहीं होता
बेख़ुद देहलवी

