दिल तो लेते हो मगर ये भी रहे याद तुम्हें
जो हमारा न हुआ कब वो तुम्हारा होगा
बेख़ुद देहलवी
ग़म में डूबे ही रहे दम न हमारा निकला
बहर-ए-हस्ती का बहुत दूर किनारा निकला
बेख़ुद देहलवी
हमें इस्लाम उसे इतना तअल्लुक़ है अभी बाक़ी
बुतों से जब बिगड़ती है ख़ुदा को याद करते हैं
बेख़ुद देहलवी
हमें पीने से मतलब है जगह की क़ैद क्या 'बेख़ुद'
उसी का नाम जन्नत रख दिया बोतल जहाँ रख दी
बेख़ुद देहलवी
हो लिए जिस के हो लिए 'बेख़ुद'
यार अपना तो ये हिसाब रहा
बेख़ुद देहलवी
हूरों से न होगी ये मुदारात किसी की
याद आएगी जन्नत में मुलाक़ात किसी की
बेख़ुद देहलवी
इजाज़त माँगती है दुख़्त-ए-रज़ महफ़िल में आने की
मज़ा हो शैख़-साहिब कह उठें बे-इख़्तियार आए
बेख़ुद देहलवी

