कोई रुस्वा कोई सौदाई है
इक जहाँ आप का शैदाई है
अज़ीज़ हैदराबादी
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मुश्किल है इमतियाज़-ए-अज़ाब-ओ-सवाब में
पीता हूँ मैं शराब मिला कर गुलाब में
अज़ीज़ हैदराबादी
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नाले हैं न आहें हैं न रोना न तड़पना
बे-ख़ुद हूँ तिरी याद में फ़ुर्सत के दिन आए
अज़ीज़ हैदराबादी
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नस्रीं में ये महक है न ये नस्तरन में है
बू-ए-गुल-ए-मुराद तिरे पैरहन में है
अज़ीज़ हैदराबादी
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शीशे खुले नहीं अभी साग़र चले नहीं
उड़ने लगी परी की तरह बू शराब की
अज़ीज़ हैदराबादी
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सोहबत-ए-ग़ैर से बचिए बचिए
देखिए देखिए रुस्वाई है
अज़ीज़ हैदराबादी
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उस ने सुन कर बात मेरी टाल दी
उलझनों में और उलझन डाल दी
अज़ीज़ हैदराबादी
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