दर्द की धूप में सहरा की तरह साथ रहे
शाम आई तो लिपट कर हमें दीवार किया
अता शाद
दिल वो सहरा है जहाँ हसरत-ए-साया भी नहीं
दिल वो दुनिया है जहाँ रंग है रानाई है
अता शाद
दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा
बला-कशान-ए-नज़र के लिए सराब सजा
अता शाद
वो क्या तलब थी तिरे जिस्म के उजाले की
मैं बुझ गया तो मिरा ख़ाना-ए-ख़राब सजा
अता शाद
चाहिए क्या तुम्हें तोहफ़े में बता दो वर्ना
हम तो बाज़ार के बाज़ार उठा लाएँगे
अता तुराब
हाँ तुझे भी तो मयस्सर नहीं तुझ सा कोई
है तिरा अर्श भी वीराँ मिरे पहलू की तरह
अता तुराब
इश्क़ तो अपने लहू में ही सँवरता है सो हम
किस लिए रुख़ पे कोई ग़ाज़ा लगा कर देखें
अता तुराब

