शाम ढलने से फ़क़त शाम नहीं ढलती है
उम्र ढल जाती है जल्दी पलट आना मिरे दोस्त
अशफ़ाक़ नासिर
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शाम होती है तो लगता है कोई रूठ गया
और शब उस को मनाने में गुज़र जाती है
अशफ़ाक़ नासिर
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वो जिस में लौट के आती थी एक शहज़ादी
अभी तलक नहीं भूली वो दास्ताँ मुझ को
अशफ़ाक़ नासिर
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वो फूल हो सितारा हो शबनम हो झील हो
तेरी किताब-ए-हुस्न के सब इक़्तिबास थे
अशफ़ाक़ नासिर
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वो शख़्स जिस की ख़ुशी का बाइस थीं मेरी बातें
उसे अब उन पर मलाल करने भी आ गए हैं
अशफ़ाक़ नासिर
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हम से पूछो मिज़ाज बारिश का
हम जो कच्चे मकान वाले हैं
अशफ़ाक़ अंजुम
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आओ तो मेरे सहन में हो जाए रौशनी
मुद्दत गुज़र गई है चराग़ाँ किए हुए
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
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