ज़िक्र-ए-अस्लाफ़ से बेहतर है कि ख़ामोश रहें
कल नई नस्ल में हम लोग भी बूढ़े होंगे
असग़र मेहदी होश
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जो लोग मेरा नक़्श-ए-क़दम चूम रहे थे
अब वो भी मुझे राह दिखाने चले आए
असग़र राही
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ग़ुबार सा है सर-ए-शाख़-सार कहते हैं
चला है क़ाफ़िला-ए-नौ-बहार कहते हैं
असग़र सलीम
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इस एक बात से गुलचीं का दिल धड़कता है
कि हम सबा से हदीस-ए-बहार कहते हैं
असग़र सलीम
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जिसे कभी सर-ए-मिंबर न कह सका वाइज़
वो बात अहल-ए-जुनूँ ज़ेर-ए-दार कहते हैं
असग़र सलीम
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दिल में 'असग़र' के ख़ुशियों की बरसात थी
हँसते हँसते वो क्यूँ ग़म-ज़दा हो गया
असग़र शमीम
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कहाँ सर छुपाएँ पता ही नहीं
कि गिरने लगी घर की दीवार अब
असग़र शमीम
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