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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

दीवार उन के घर की मिरी धूप ले गई
ये बात भूलने में ज़माना लगा मुझे

असग़र मेहदी होश




डूबने वाले को साहिल से सदाएँ मत दो
वो तो डूबेगा मगर डूबना मुश्किल होगा

असग़र मेहदी होश




गिर भी जाती नहीं कम-बख़्त कि फ़ुर्सत हो जाए
कौंदती रहती है बिजली मिरे ख़िर्मन के क़रीब

असग़र मेहदी होश




हम भी करते रहें तक़ाज़ा रोज़
तुम भी कहते रहो कि आज नहीं

असग़र मेहदी होश




जाने किस किस का गला कटता पस-ए-पर्दा-ए-इश्क़
खुल गए मेरी शहादत में सितमगर कितने

असग़र मेहदी होश




जो हादिसा कि मेरे लिए दर्दनाक था
वो दूसरों से सुन के फ़साना लगा मुझे

असग़र मेहदी होश




जो साए बिछाते हैं फल फूल लुटाते हैं
अब ऐसे दरख़्तों को इंसान कहा जाए

असग़र मेहदी होश