तू ने अब तक जिसे नहीं समझा
और फिर उस की बंदगी कब तक
असग़र वेलोरी
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उन के हाथों से मिला था पी लिया
ज़हर था पर ज़ाइक़ा अच्छा लगा
असग़र वेलोरी
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ज़िंदगी से समझौता आज हो गया कैसे
रोज़ रोज़ तो ऐसे सानेहे नहीं होते
असग़र वेलोरी
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'अशहर' कहीं क़रीब ही तारीक ग़ार है
जुगनू की रौशनी को वहीं चल के छोड़ दें
अशहर हाशमी
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मेरी दुनिया में समुंदर का कहीं नाम नहीं
फिर घटा फेंकती है मुझ पे ये पत्थर कैसे
अशहर हाशमी
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रहगुज़र भी तिरी पहले थी अजनबी
हर गली अब तिरी रहगुज़र हो गई
अशहर हाशमी
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तिरा ग़ुरूर झुक के जब मिला मिरे वजूद से
न जाने मेरी कमतरी का चेहरा क्यूँ उतर गया
अशहर हाशमी
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