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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

रक़म करूँ भी तो कैसे मैं दास्तान-ए-वफ़ा
हुरूफ़ फिरते हैं बेगाने मेरे काग़ज़ से

अरशद जमाल 'सारिम'




सुपुर्द-ए-आब यूँ ही तो नहीं करता हूँ ख़ाक अपनी
अजब मिट्टी के घुलने का मज़ा बारिश में रहता है

अरशद जमाल 'सारिम'




वो इक लम्हा सज़ा काटी गई थी जिस की ख़ातिर
वो लम्हा तो अभी हम ने गुज़ारा ही नहीं था

अरशद जमाल 'सारिम'




ज़िंदगी हम से तिरी आँख-मिचोली कब तक
इक न इक रोज़ किसी मोड़ पे आ लेंगे तुझे

अरशद जमाल 'सारिम'




ज़िंदगी तू भी हमें वैसे ही इक रोज़ गुज़ार
जिस तरह हम तुझे बरसों से गुज़ारे हुए हैं

अरशद जमाल 'सारिम'




जाने शब को क्या सूझी थी रिंदों को समझाने आए
सुबह को सारे मय-कश उन को मस्जिद तक पहुँचाने आए

अरशद काकवी




बिला-सबब तो कोई बर्ग भी नहीं हिलता
तू अपने आज पे असरात कल के देख ज़रा

अरशद कमाल