इश्क़ से बाज़ आते हम दीवाने क्या
थी समझ की बात हम समझे नहीं
आमिर मौसवी
आबलों का शिकवा क्या ठोकरों का ग़म कैसा
आदमी मोहब्बत में सब को भूल जाता है
आमिर उस्मानी
अक़्ल थक कर लौट आई जादा-ए-आलाम से
अब जुनूँ आग़ाज़ फ़रमाएगा इस अंजाम से
आमिर उस्मानी
बाक़ी ही क्या रहा है तुझे माँगने के बाद
बस इक दुआ में छूट गए हर दुआ से हम
आमिर उस्मानी
हमें आख़िरत में 'आमिर' वही उम्र काम आई
जिसे कह रही थी दुनिया ग़म-ए-इश्क़ में गँवा दी
आमिर उस्मानी
इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है
आफ़तें बरसती हैं दिल सुकून पाता है
आमिर उस्मानी
इश्क़ सर-ता-ब-क़दम आतिश-ए-सोज़ाँ है मगर
उस में शोला न शरारा न धुआँ होता है
आमिर उस्मानी

