रोज़ हम जलती हुई रेत पे चलते ही न थे
हम ने साए में खजूरों के भी आराम किया
अम्बर बहराईची
सूप के दाने कबूतर चुग रहा था और वो
सेहन को महका रही थी सुन्नतें पढ़ते हुए
अम्बर बहराईची
उस ने हर ज़र्रे को तिलिस्म-आबाद किया
हाथ हमारे लगी फ़क़त हैरानी है
अम्बर बहराईची
ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा
मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था
अम्बर बहराईची
अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का जवाब
होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की
अंबरीन हसीब अंबर
ऐ आसमाँ किस लिए इस दर्जा बरहमी
हम ने तो तिरी सम्त इशारा नहीं किया
अंबरीन हसीब अंबर
अयाँ दोनों से तक्मील-ए-जहाँ है
ज़मीं गुम हो तो फिर क्या आसमाँ है
अंबरीन हसीब अंबर

