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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

पैरवी से मुमकिन है कब रसाई मंज़िल तक
नक़्श-ए-पा मिटाने को गर्द-ए-राह काफ़ी है

अंबरीन हसीब अंबर




तअ'ल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना
कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं

अंबरीन हसीब अंबर




तश्हीर तो मक़्सूद नहीं क़िस्सा-ए-दिल की
सो तुझ को लिखा तेरी निशानी नहीं लिक्खी

अंबरीन हसीब अंबर




तिरे फ़िराक़ में दिल का अजीब आलम है
न कुछ ख़ुमार से बढ़ कर न कुछ ख़ुमार से कम

अंबरीन हसीब अंबर




तुम ने किस कैफ़ियत में मुख़ातब किया
कैफ़ देता रहा लफ़्ज़-ए-'तू' देर तक

अंबरीन हसीब अंबर




उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे

अंबरीन हसीब अंबर




उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है

अंबरीन हसीब अंबर