पैरवी से मुमकिन है कब रसाई मंज़िल तक
नक़्श-ए-पा मिटाने को गर्द-ए-राह काफ़ी है
अंबरीन हसीब अंबर
तअ'ल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना
कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं
अंबरीन हसीब अंबर
तश्हीर तो मक़्सूद नहीं क़िस्सा-ए-दिल की
सो तुझ को लिखा तेरी निशानी नहीं लिक्खी
अंबरीन हसीब अंबर
तिरे फ़िराक़ में दिल का अजीब आलम है
न कुछ ख़ुमार से बढ़ कर न कुछ ख़ुमार से कम
अंबरीन हसीब अंबर
तुम ने किस कैफ़ियत में मुख़ातब किया
कैफ़ देता रहा लफ़्ज़-ए-'तू' देर तक
अंबरीन हसीब अंबर
उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे
अंबरीन हसीब अंबर
उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है
अंबरीन हसीब अंबर

