'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
गुंजाइश-ए-दो-शाह नहीं एक मुल्क में
वहदानियत के हक़ की यही बस दलील है
शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान
गुंजाइश-ए-दो-शाह नहीं एक मुल्क में
वहदानियत के हक़ की यही बस दलील है
शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान
कुछ सुर्ख़ जो है रंग मिरे अश्क-ए-रवाँ का
शायद कोई टूटा दिल-ए-मजरूह का टाँका
शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान
चूम कर आया है ये दस्त-ए-हिनाई आप का
क्यूँ न रक्खूँ मैं कलेजे से लगा कर तीर को
शेर सिंह नाज़ देहलवी
चूम कर आया है ये दस्त-ए-हिनाई आप का
क्यूँ न रक्खूँ मैं कलेजे से लगा कर तीर को
शेर सिंह नाज़ देहलवी
निगह-ए-लुत्फ़ में है उक़्दा-कुशाई मुज़्मर
काम बिगड़े हुए बंदों के सँवर जाते हैं
शेर सिंह नाज़ देहलवी