वो और होंगे पी के जो सरशार हो गए
हर जाम से हमें तो नई तिश्नगी मिली
साहिर होशियारपुरी
कल तो इस आलम-ए-हस्ती से गुज़र जाना है
आज की रात तिरी बज़्म में हम और सही
साहिर लखनवी
क्यूँ मेरी तरह रातों को रहता है परेशाँ
ऐ चाँद बता किस से तिरी आँख लड़ी है
साहिर लखनवी
क्यूँ मेरी तरह रातों को रहता है परेशाँ
ऐ चाँद बता किस से तिरी आँख लड़ी है
साहिर लखनवी
मंज़िलें पाँव पकड़ती हैं ठहरने के लिए
शौक़ कहता है कि दो चार क़दम और सही
साहिर लखनवी
अँधेरी शब में भी तामीर-ए-आशियाँ न रुके
नहीं चराग़ तो क्या बर्क़ तो चमकती है
साहिर लुधियानवी
अँधेरी शब में भी तामीर-ए-आशियाँ न रुके
नहीं चराग़ तो क्या बर्क़ तो चमकती है
साहिर लुधियानवी

