नक़्श-ए-क़दम हैं राह में फ़रहाद-ओ-क़ैस के
ऐ इश्क़ खींच कर मुझे लाया इधर कहाँ
साहिर देहल्वी
पाबंदी-ए-अहकाम-ए-शरीअत है वहाँ फ़र्ज़
रिंदों को रुख़-ए-साक़ी-ओ-साग़र हुए मख़्सूस
साहिर देहल्वी
पाबंदी-ए-अहकाम-ए-शरीअत है वहाँ फ़र्ज़
रिंदों को रुख़-ए-साक़ी-ओ-साग़र हुए मख़्सूस
साहिर देहल्वी
क़दम है ऐन हुदूस और हुदूस ऐन क़दम
जो तू न जल्वे में आता तो मैं कहाँ होता
साहिर देहल्वी
क़ुल्ज़ुम-ए-फ़िक्र में है कश्ती-ए-ईमाँ सालिम
ना-ख़ुदा हुस्न है और इश्क़ है लंगर अपना
साहिर देहल्वी
क़ुल्ज़ुम-ए-फ़िक्र में है कश्ती-ए-ईमाँ सालिम
ना-ख़ुदा हुस्न है और इश्क़ है लंगर अपना
साहिर देहल्वी
शेर क्या है आह है या वाह है
जिस से हर दिल की उभर आती है चोट
साहिर देहल्वी

