यक़ीं उठ जाए अपने दस्त-ओ-पा से
उसी का नाम लोगो ख़ुद-कुशी है
सईद अख़्तर
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यक़ीं उठ जाए अपने दस्त-ओ-पा से
उसी का नाम लोगो ख़ुद-कुशी है
सईद अख़्तर
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निकल के जाऊँ कहाँ मैं हिसार-ए-गर्दिश से
सफ़र ने पाँव में ज़ंजीर कर लिया है मुझे
सईद ख़ान
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चीज़ें अपनी जगह पे रहती हैं
तीरगी बस उन्हें छुपाती है
सईद नक़वी
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इब्तिदा मुझ में इंतिहा मुझ में
इक मुकम्मल है वाक़िआ मुझ में
सईद नक़वी
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इब्तिदा मुझ में इंतिहा मुझ में
इक मुकम्मल है वाक़िआ मुझ में
सईद नक़वी
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जब आईने दर-ओ-दीवार पर निकल आएँ
तो शहर-ए-ज़ात में रहना भी इक क़यामत है
सईद नक़वी
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