सजा कर चार-सू रंगीं महल तेरे ख़यालों के
तिरी यादों की रानाई में ज़ेबाई में जीते हैं
सबीहा सबा
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चिलचिलाती-धूप थी लेकिन था साया हम-क़दम
साएबाँ की छाँव ने मुझ को अकेला कर दिया
साबिर
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फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी
अब न कहना ज़मीन बंजर है
साबिर
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फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी
अब न कहना ज़मीन बंजर है
साबिर
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हँस हँस के उस से बातें किए जा रहे हो तुम
'साबिर' वो दिल में और ही कुछ सोचता न हो
साबिर
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हम उस की ख़ातिर बचा न पाएँगे उम्र अपनी
फ़ुज़ूल-ख़र्ची की हम को आदत सी हो गई है
साबिर
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हम उस की ख़ातिर बचा न पाएँगे उम्र अपनी
फ़ुज़ूल-ख़र्ची की हम को आदत सी हो गई है
साबिर
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