छुप जाएँ कहीं आ कि बहुत तेज़ है बारिश
ये मेरे तिरे जिस्म तो मिट्टी के बने हैं
सबा इकराम
छुप जाएँ कहीं आ कि बहुत तेज़ है बारिश
ये मेरे तिरे जिस्म तो मिट्टी के बने हैं
सबा इकराम
क्या ज़िक्र कि इस ज़ीस्त में कुछ खोया कि पाया
अब कुछ भी तो रक्खा नहीं इस सूद ओ ज़ियाँ में
सबा नुसरत
तुझ से दूरी और क़यामत लगती है
आपस में दो वक़्त जो मिलने लगते हैं
सबा नुसरत
तुझ से दूरी और क़यामत लगती है
आपस में दो वक़्त जो मिलने लगते हैं
सबा नुसरत
कोई मसरूफ़ियत होगी वगर्ना मस्लहत होगी
न इस पैमाँ-फ़रामोशी से उस को बेवफ़ा कहना
सबीहा सबा
सजा कर चार-सू रंगीं महल तेरे ख़यालों के
तिरी यादों की रानाई में ज़ेबाई में जीते हैं
सबीहा सबा

