रवाँ है क़ाफ़िला-ए-रूह-ए-इलतिफ़ात अभी
हमारी राह से हट जाए काएनात अभी
सबा अकबराबादी
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रवाँ है क़ाफ़िला-ए-रूह-ए-इलतिफ़ात अभी
हमारी राह से हट जाए काएनात अभी
सबा अकबराबादी
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समझेगा आदमी को वहाँ कौन आदमी
बंदा जहाँ ख़ुदा को ख़ुदा मानता नहीं
सबा अकबराबादी
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सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके
जी चाहता है फिर उसे इक बार देखना
सबा अकबराबादी
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सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके
जी चाहता है फिर उसे इक बार देखना
सबा अकबराबादी
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टुकड़े हुए थे दामन-ए-हस्ती के जिस क़दर
दल्क़-ए-गदा-ए-इश्क़ के पैवंद हो गए
सबा अकबराबादी
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मैं बाज़गश्त-ए-दिल हूँ पैहम शिकस्त-ए-दिल हूँ
वो आज़मा रहा हूँ जो आज़मा चुका हूँ
सबा अख़्तर
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