मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है
आख़िर इस दिल को ये हुआ क्या है
एस ए मेहदी
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मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है
आख़िर इस दिल को ये हुआ क्या है
एस ए मेहदी
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आँखों से वो कभी मिरी ओझल नहीं रहा
ग़ाफ़िल मैं उस की याद से इक पल नहीं रहा
सअादत सईद
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ऐसे लगता है कि कमज़ोर बहुत है तू भी
जीत कर जश्न मनाने की ज़रूरत क्या थी
सादुल्लाह शाह
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ऐसे लगता है कि कमज़ोर बहुत है तू भी
जीत कर जश्न मनाने की ज़रूरत क्या थी
सादुल्लाह शाह
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अपनी सोचें सफ़र में रहती हैं
उस को पाने की जुस्तुजू देखो
सादुल्लाह शाह
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मुझ सा कोई जहान में नादान भी न हो
कर के जो इश्क़ कहता है नुक़सान भी न हो
सादुल्लाह शाह
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