ये सुन के आज हश्र में वो बात भी तो हो
हँस कर कहा कि दिन है कहीं रात भी तो हो
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़रा जो हम ने उन्हें आज मेहरबाँ देखा
न हम से पूछिए क्या रंग-ए-आसमाँ देखा
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़र्फ़-ए-वज़ू है जाम है इक ख़म है इक सुबू
इक बोरिया है मैं हूँ मिरी ख़ानक़ाह है
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़र्फ़-ए-वज़ू है जाम है इक ख़म है इक सुबू
इक बोरिया है मैं हूँ मिरी ख़ानक़ाह है
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़ेर-ए-मस्जिद मय-कदा में मय-कदे में मस्त-ए-ख़्वाब
चौंक उठा जब दी मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ बाला-ए-सर
रियाज़ ख़ैराबादी
बाद में रखे सराबों के दयारों में क़दम
पहले वो साँस की सरहद पे तो आ कर देखे
रियाज़ लतीफ़
बस लहू की बूँद थी एहसास में
फिर उगाया दश्त ने इक सर नया
रियाज़ लतीफ़

