अच्छी पी ली ख़राब पी ली
जैसी पाई शराब पी ली
रियाज़ ख़ैराबादी
अहल-ए-हरम से कह दो कि बिगड़ी नहीं है बात
सब रिंद जानते हैं अभी पारसा मुझे
रियाज़ ख़ैराबादी
ऐसी ही इंतिज़ार में लज़्ज़त अगर न हो
तो दो घड़ी फ़िराक़ में अपनी बसर न हो
रियाज़ ख़ैराबादी
अल्लाह-रे नाज़ुकी कि जवाब-ए-सलाम में
हाथ उस का उठ के रह गया मेहंदी के बोझ से
रियाज़ ख़ैराबादी
अज़ाँ का काम चल जाए जो नाक़ूस-ए-बरहमन से
बड़ा ये बोझ उतरे ऐ मोअज़्ज़िन तेरी गर्दन से
रियाज़ ख़ैराबादी
बड़े पाक तीनत बड़े साफ़ बातिन
'रियाज़' आप को कुछ हमीं जानते हैं
रियाज़ ख़ैराबादी
बाग़बाँ काम हमें क्या है वो उजड़े कि रहे
जब हमीं बाग़ से निकले तो नशेमन कैसा
रियाज़ ख़ैराबादी

