एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है
इस समुंदर में कोई और समुंदर गुम है
रफ़ी रज़ा
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एक उजड़ी हुई हसरत है कि पागल हो कर
बैन हर शहर में करती हुई देखी गई है
रफ़ी रज़ा
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किस ने रोका है सर-ए-राह-ए-मोहब्बत तुम को
तुम्हें नफ़रत है तो नफ़रत से तुम आओ जाओ
रफ़ी रज़ा
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मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी
चराग़ जैसे कोई बात करने वाला था
रफ़ी रज़ा
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पड़ा हुआ हूँ मैं सज्दे में कह नहीं पाता
वो बात जिस से कि हल्का हो कुछ ज़बान का बोझ
रफ़ी रज़ा
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तू ख़ुद अपनी मिसाल है वो तो है
इसी अपनी मिसाल में मुझे मिल
रफ़ी रज़ा
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रूह में जिस ने ये दहशत सी मचा रक्खी है
उस की तस्वीर गुमाँ भर तो बना सकते हैं
रफ़ीक राज़
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