ठहर के तलवों से काँटे निकालने वाले
ये होश है तो जुनूँ कामयाब क्या होगा
राज़ यज़दानी
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वो सामने सर-ए-मंज़िल चराग़ जलते हैं
जवाब पाँव न देते तो मैं कहाँ होता
राज़ यज़दानी
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तुम ने हँसते मुझे देखा है तुम्हें क्या मालूम
करनी पड़ती है अदा कितनी हँसी की क़ीमत
रईस रामपुरी
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वरक़ वरक़ तुझे तहरीर करता रहता हूँ
मैं ज़िंदगी तिरी तशहीर करता रहता हूँ
रईसुदीन रईस
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आईने को तोड़ा है तो मालूम हुआ है
गुज़रा हूँ किसी दश्त-ए-ख़तरनाक से आगे
रफ़ी रज़ा
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धूप छाँव का कोई खेल है बीनाई भी
आँख को ढूँड के लाया हूँ तो मंज़र गुम है
रफ़ी रज़ा
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एक दिन अपना सहीफ़ा मुझ पे नाज़िल हो गया
उस को पढ़ते ही मिरी सारी ख़ताएँ मर गईं
रफ़ी रज़ा
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