ये मेरी तमन्ना है प्यासों के मैं काम आऊँ
यारब मिरी मिट्टी को पैमाना बना देना
राज़ इलाहाबादी
हर इक शिकस्त-ए-तमन्ना पे मुस्कुराते हैं
वो क्या करें जो मुसलसल फ़रेब खाते हैं
राज़ मुरादाबादी
किसी के वादा-ए-सब्र-आज़मा की ख़ैर कि हम
अब ए'तिबार की हद से गुज़रते जाते हैं
राज़ मुरादाबादी
रंग-ओ-बू के पर्दे में कौन ये ख़िरामाँ है
हर नफ़स मोअत्तर है हर नज़र ग़ज़ल-ख़्वाँ है
राज़ मुरादाबादी
अगर गुनाह के क़िस्से भी कह दिए तुझ से
गुनाहगार को यारब सवाब क्या होगा
राज़ यज़दानी
सज़ा के झेलने वाले ये सोचना है गुनाह
कोई क़ुसूर भी तुझ से कभी हुआ कि नहीं
राज़ यज़दानी
ठहर के पाँव के काटे निकालने वाले
ये होश है तो जुनूँ कामयाब क्या होगा
राज़ यज़दानी

