टूटा जो काबा कौन सी ये जा-ए-ग़म है शैख़
कुछ क़स्र-ए-दिल नहीं कि बनाया न जाएगा
क़ाएम चाँदपुरी
वहशत-ए-दिल कोई शहरों में समा सकती है
काश ले जाए जुनूँ सू-ए-बयाबाँ मुझ को
क़ाएम चाँदपुरी
याँ तलक ख़ुश हूँ अमारिद से कि ऐ रब्ब-ए-करीम
काश दे हूर के बदले भी तू ग़िल्माँ मुझ को
क़ाएम चाँदपुरी
ये पास-ए-दीं तिरा है सब उस वक़्त तक कि शैख़
देखा नहीं है तू ने वो काफ़िर फ़रंग का
क़ाएम चाँदपुरी
ज़ालिम तू मेरी सादा-दिली पर तो रहम कर
रूठा था तुझ से आप ही और आप मन गया
क़ाएम चाँदपुरी
नक़्श-ए-कफ़-ए-पा ने गुल खिलाए
वीराँ कहाँ अब ये रास्ता है
क़य्यूम नज़र
पूछो तो एक एक है तन्हा सुलग रहा
देखो तो शहर शहर है मेला लगा हुआ
क़य्यूम नज़र

