क़ाएम मैं ग़ज़ल तौर किया रेख़्ता वर्ना
इक बात लचर सी ब-ज़बान-ए-दकनी थी
क़ाएम चाँदपुरी
'क़ाएम' मैं इख़्तियार किया शाएरी का ऐब
पहुँचा न कोई शख़्स जब अपने हुनर तलक
क़ाएम चाँदपुरी
'क़ाएम' मैं रेख़्ता को दिया ख़िलअत-ए-क़ुबूल
वर्ना ये पेश-ए-अहल-ए-हुनर क्या कमाल था
क़ाएम चाँदपुरी
क़ाज़ी ख़बर ले मय को भी लिक्खा है वाँ मुबाह
रिश्वत का है जवाज़ तिरी जिस किताब में
क़ाएम चाँदपुरी
क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद
कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया
क़ाएम चाँदपुरी
क़िस्सा-ए-बरहना-पाई को मिरे ऐ मजनूँ
ख़ार से पूछ कि सब नोक-ए-ज़बाँ है उस को
क़ाएम चाँदपुरी
रस्म इस घर की नहीं दाद किसू की दे कोई
शोर-ओ-ग़ौग़ा न कर ऐ मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार अबस
क़ाएम चाँदपुरी

