तेरी निगह से तुझ को ख़बर है कि क्या हुआ
दिल ज़िंदगी से बार-ए-दिगर आश्ना हुआ
क़य्यूम नज़र
याद आया भी तो यूँ अहद-ए-वफ़ा
आह की बे-असरी याद आई
क़य्यूम नज़र
बर-अक्स क्यूँ हुआ है ज़माने के फेर में
हैराँ है कोई दुख में किसे दस्तरस हुआ
क़ाज़ी महमूद बेहरी
यक नुक्ता नुक्ता-दाँ कूँ है काफ़ी शनास का
ऐ क़िस्सा-ख़्वाँ न बोल हिकायत क़यास का
क़ाज़ी महमूद बेहरी
आतिश-ए-इश्क़ से बचिए कि यहाँ हम ने भी
मोम की तरह से पत्थर को पिघलते देखा
क़ैसर ख़ालिद
अब इस तरह भी रिवायत से इंहिराफ़ न कर
बदल अगरचे तू अच्छा न दे, ख़राब तो दे
क़ैसर ख़ालिद
बातों से फूल झड़ते थे लेकिन ख़बर न थी
इक दिन लबों से उन के ही नश्तर भी आएँगे
क़ैसर ख़ालिद

