ये इंतिज़ार की घड़ियाँ ये शब का सन्नाटा
इस एक शब में भरे हैं हज़ार साल के दिन
क़मर सिद्दीक़ी
अजब तरह की है दुनिया ब-रंग-ए-बू-क़लमूँ
कि है हर एक जुदागाना अल-अमाँ तन्हा
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
बस नहीं चलता है वर्ना अपने मर जाने के साथ
फेंक देते खोद कर दुनिया की सब बुनियाद हम
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
है जुदा सज्दा की जा हिन्दू मुसलमाँ की मगर
फ़हम वालों के तईं दैर-ओ-हरम दोनों एक
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
इश्क़ है ऐ दिल कठिन कुछ ख़ाना-ए-ख़ाला नहीं
रख दिलेराना क़दम ता तुझ को हो इमदाद-ए-दाद
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
काम है मतलब से चाहे कुफ़्र होवे या कि दीं
जा पहुँचना है किसी सूरत से अपने यार तक
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ख़ुदा को सज्दा कर के मुब्तज़िल ज़ाहिद हुआ अब तो
तो जा कर मह-जबीं के आस्ताँ पे जुब्बा-साई कर
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

