जिस दिन से बने हो तुम मसीहा
हाल और ख़राब हो गया है
क़ैसर-उल जाफ़री
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जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे
क़ैसर-उल जाफ़री
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कम से कम रेत से आँखें तो बचेंगी 'क़ैसर'
मैं हवाओं की तरफ़ पीठ किए बैठा हूँ
क़ैसर-उल जाफ़री
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मैं ज़हर पीता रहा ज़िंदगी के हाथों से
ये और बात है मेरा बदन हरा न हुआ
क़ैसर-उल जाफ़री
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रास्ता देख के चल वर्ना ये दिन ऐसे हैं
गूँगे पत्थर भी सवालात करेंगे तुझ से
क़ैसर-उल जाफ़री
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रास्ता देख के चल वर्ना ये दिन ऐसे हैं
गूँगे पत्थर भी सवालात करेंगे तुझ से
क़ैसर-उल जाफ़री
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रक्खी न ज़िंदगी ने मिरी मुफ़लिसी की शर्म
चादर बना के राह में फैला गई मुझे
क़ैसर-उल जाफ़री
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