किसी मंज़िल में भी हासिल न हुआ दिल को क़रार
ज़िंदगी ख़्वाहिश-ए-नाकाम ही करते गुज़री
क़ैशर शमीम
मौसम अजीब रहता है दल के दयार का
आगे हैं लू के झोंके भी ठंडी हवा के बा'द
क़ैशर शमीम
मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं
मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
क़ैशर शमीम
साज़ से मेरे ग़लत नग़्मों की उम्मीद न कर
आग की आग है दिल में तो धुआँ क्यूँकर हो
क़ैशर शमीम
सब्ज़ मौसम से मुझे क्या लेना
शाख़ से अपनी जुदा हूँ बाबा
क़ैशर शमीम
उस के आँगन में रौशनी थी मगर
घर के अंदर बड़ा अँधेरा था
क़ैशर शमीम
आज बरसों में तो क़िस्मत से मुलाक़ात हुई
आप मुँह फेर के बैठे हैं ये क्या बात हुई
क़ैसर-उल जाफ़री

